
SO LET'S START THE STORY:– YOU ARE MY SUNSHINE
पूरे छह घंटे के सफ़र के बाद…
उनकी कार एक बड़े से मेंशन के सामने आ कर रुकी।
माधवी मेंशन…
वो सब माधवी मेंशन पहुंच गए।
अब तक तो परी भी उठ गई थीं। जैसे ही उसने कार से बाहर देखा तो वो खुशी से झूम उठी।
वॉचमैन ने कार देखते ही गेट खोल दिया था। उन्हें पहले ही बता दिया गया था कि आज शान और नैना बाकी सब के साथ आने वाले हैं।
शान ने अंदर आ कर कार रोकी तो सबसे पहले परी बहार आई और मैन गेट की तरफ़ भागी।
वहां एक मिडिल एज आदमी उन सबका ही इंतज़ार कर रहे थे। उन्हें देख कर परी ज़ोर से चिल्लाई, " दादू।"
और भागते हुए उनके गले लग गई।
उन्होंने भी खुश से परी को अपने गले से लगाया।
ये थे सुधांशु मेहरा।
मेहरा इंडस्ट्रीज के चेयरमैन। नैना और शान के डैड।
उन्होंने कहा, " आ गया मेरा बच्चा। कैसी है हमारी प्रिंसेस? दादू आपका कब से इंतज़ार कर रहे थे।" उन्होंने उसके सर को चूमते हुए कहा।
परी ने जवाब दिया - "अब मैं आ गई न।" और वो मुस्कुराने लगी।
शान और सौरभ ने कार पार्किंग में लगाई।
शान और नैना भी उनके पास आए।
नैना आते ही पूछा, " कैसे है डैड ? "
सुधांशु ने जवाब में कहा, " मैं ठीक हूं मिनी।"
वंदना, सौरभ और गौरव भी अब तक सारा सामान निकाल कर वहां आ गए थे।
उन तीनों ने सुधांशु जी को ग्रीट किया। वो
फ़िर नैना की तरफ़ मुड़ते हुए कहा, "हम तीनों कॉटेज में जाते है।"
नैना ने भी बस हां में सर हिलाया और वो तीनों चले गए।
सुधांशु जी ने कहा, " शान तुम परी को उसके रुम में ले जाओ।"
जवाब में शान ने भी हां में सर हिलाया और परी को लेकर मेंशन के अंदर चला गया।
अब वहां सिर्फ़ सुधांशु और नैना थे।
"कैसी हो मिनी?" उन्होंने पूछा तो नैना ने कुछ भी नहीं कहा। बस अपना सर झुका लिया।
"बेटे क्या तुम्हें अपने डैड से भी खुद को छुपाने की ज़रूरत है। " सुधांशु जी की बात सुनकर वो उनके गले लग गई।
उसने अब भी कुछ भी नहीं कहा।
सुधांशु ने उसका सर सहलाते हुए कहा, "मैं सब समझता हूं मिनी। सब कुछ। तुम चिंता मत करो।"
"डर लग रहा है डैड कहीं…" इसके आगे वो कुछ बोल ही नहीं पाई।
उन्होंने नैना को खुद से अलग कर उसके आंसू पोछते हुए कहा, " अपने डैड पे भरोसा है ना तुम्हें मिनी।"
नैना ने जवाब में सिर्फ़ हां में सर हिलाया और उन्हें देखने लगी।
"तो बस फ़िर तुम्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। ठीक हैं। चलो अंदर चलते हैं।" सुधांशु ने कहा और उसके कंधे पे हाथ रखते हुए उसे साथ लिए घर के अंदर चले गए।
हॉल में आते ही…
सुधांशु जी ने नैना से कहा, " मिनी अपने रूम में जाओ फ्रेश हो जाओ। तब तक मैं डिनर लगवाता हूं। "
"जी डैड।"
नैना इतना बोल कर अपने कमरे की तरफ़ बढ़ गई। उसका रुम सेकंड फ्लोर का मास्टर बेडरूम था।
ये देख परी जो हॉल में बैठे ये सब देख रही थीं।
उसने शान के पास जा कर धीरे से कहा, " डैडी आपको नहीं लगाता की दादू आपसे ज्यादा मम्मा से प्यार करते हैं ! "
शान ने जब ये सुना तो उसने परी की ओर देखते हुए कहा, " जाओ एक बार अपने दादू से कहकर दिखाओ तो। "
दीया ये सुनते ही झट से खड़ी हुई और बोली, " मैंने कहां कुछ कहा आप भी न डैडी।"
सुधांशु जी हॉल में आए और बैठते हुए बोले, " तुम दोनों भी अपने रुम में जाओ और फ्रेश हो जाओ। डिनर लग रहा है।"
परी और शान का रुम फर्स्ट फ्लोर के दुसरे कोने पे था।
दोनों जल्दी से उठे और अपने रुम की तरफ़ चले गए।
ये देख सुधांशु मुस्कुराने लगे।
तभी वहां उनका केयरटेकर रमेश आता हैं।
वो कहता है, " सर छोटी मैडम के लिए कुछ और बनाना है तो कहिए मैं बनवा देता हुं।
रमेश तब से सुधांशु जी के साथ हैं जब उनकी शादी हुई थीं। इसलिए वो उन्हें अच्छे समझते थे की आज वो कितने खुश हैं।
सुधांशु जी ने कहा, "हां! रमेश। जाओ कुक से बोलकर कस्टर्ड बनवा दो। उसे रात में खाना खाने के बाद कस्टर्ड खाना पसंद है। पता नहीं वहां वो खाती भी होगी या नहीं।"
आज कितने दिनों के बाद उनके बच्चे उनके पास आए थे। चाहें वजह कुछ भी हो लेकिन वो बहुत खुश थे उन तीनों के आने से।
रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे।
नैना, शान और परी …
तीनों सुधांशु जी के साथ डाइनिंग टेबल पे खाना खाने बैठे थे।
सुधांशु ने नैना को अपने ही बगल में बैठाया था। वो खुद उसकी प्लेट में खाना डाल रहे थे।
उन्होंने कहा, "मिनी आज खाना मैंने खुद इंस्ट्रक्शन दे कर बनवाया है। बिलकुल वैसे ही जैसे तुम्हें पसंद हैं। तुम्हें पसंद तो आया ना?" सुधांशु ने पूछा।
"हां! डैड सब अच्छा है। और आपने सिर्फ़ अपनी पसंद छोड़ हम तीनों के पसंद का खाना बनवाया है। ऐसा क्यों किया आपने?" नैना ने जवाब देते हुए सुधांशु से सवाल किया।
उन्होंने नैना को अपने हाथों से खिलाते हुए कहा, " आज कितने वक्त बाद मेरे बच्चे घर लौटे हैं। मैं कैसे नहीं तुम तीनों की पसंद को ध्यान में रखता। और वैसे भी मैं आज बहुत खुश हूं इसलिए चलो खाना खाओ। फिर मैं और तुम वॉक पे जाएंगे गार्डन में पहले की तरह।"
नैना ने कुछ नहीं कहा बस हां में अपना सर हिला दिया।
शान और परी ये सब देख रहे थे। दोनों ही मुस्कुरा रहे थे।
शान ने कहा, " डैड ! आप मुझे भी… "
इसे पहले वो आगे कुछ बोलता सुधांशु जी ने एक निवाला उसके मुंह में डाल दिया।
और फिर एक कौर परी को भी खिलाया।
वो बोले, " मैं अपने बच्चों में फ़र्क नहीं करता। अब जल्दी खाना खत्म करो। बहुत रात हो रही हैं, सोना भी है। "
"ठीक हैं दादू। " परी ने कहा,-- और हंसने लगी।
सब ने शांति से अपना खाना खत्म किया हाथ धोकर हॉल में बैठे थे।
परी ने कहा, " डैडी! मुझे नींद आ रही है।"
शान ने परी को देखा जो उसकी पास बैठी थी और नींद से उसकी आंखें बोझिल हो रही थी।
उसने कहा, " ठीक हैं डैडी आपको रुम में ले चलते हैं।"
फिर उसने नैना को देखते हुए कहा, " नैना , डैड मैं परी को उसके रूम में सुला देता हूं।"
" ठीक हैं शान। पर तुम भी जल्दी सो जाना। बहुत थक गए हो तुम। रुम में जाकर कोई काम नहीं करोगे, सिर्फ़ आराम करोगे। समझे। मैं देखने आऊंगी।" नैना ने शान से कहा तो सुधांशु मुस्कुरा उठे।
ये देख नैना बोली, - " आपको खुश होने की ज़रूरत नहीं है। आपको भी दवाई खाने के बाद आराम करना है। मुझे पता है आज आपने कितना आराम किया होगा।"
इस बार शान धीरे से हंसने लगा।
उसने परी को गोद में उठाया और उसे उसके रुम में ले जाकर सुला दिया और अच्छे से चादर भी ओढ़ा दी। और सर पर थपकी देने लगा।
थोड़ी देर बाद…
वो उसके माथे को चूमते हुए बोला, " गुड नाईट मेरा बच्चा।" और फिर लाइट्स ऑफ कर दरवाज़ा हल्के से बंद कर रूम से बाहर आ गया।
उसने ऊपर से ही हॉल में देखा तो नैना सुधांशु के गोद में सर रख कर सोफे पे लेटी हुई थी।
और सुधांशु उसके सर पे हाथ फेर रहे थे, जैसे वो नैना को बेफिक्र करने की कोशिश कर रहे हो।
ये देख वो हल्के से मुस्कुराया और अपने कमरे में चला गया।
इधर हॉल में--
रमेश ट्रे में दो बाउल कस्टर्ड लेकर आए और और सामने रख कर बोले, "सर आपके और छोटी मैडम के लिए कस्टर्ड।" इतना बोल वो वहां से चले गए।
सुधांशु जी ने कहा, " मिनी बेटा लो कस्टर्ड खाओ। तुम्हें पसंद है न खाना खाने के बाद कस्टर्ड खाना। "
नैना ने अपनी आंखें खोली और देखा तो सामने टेबल पे दो बाउल मे कस्टर्ड था।
उसने कहा, -- " आप क्यों इतना परेशान होते हैं। मैं ठीक हूं डैड। "
वो उठी और एक बाउल उन्हें दिया और दूसरा खुद लिया ।
दोनो ही कस्टर्ड खाने लगे।
तकरीबन 10 मिनट से भी कम समय में दोनों ने अपना अपना कस्टर्ड का बाउल खत्म कर दिया।
इस दौरान दोनों में से किसी ने भी कुछ भी नहीं कहा।
" वॉक पे चलोगी मिनी। बहुत वक्त हो गया है तुम्हारे साथ वॉक किए? " सुधांशु जी बोले
तो नैना उठी और उसने सुधांशु का हाथ पकड़ा और बहार गार्डन की तरफ़ चल दी।
सुधांशु जी भी मुस्कुराते हुए साथ हो लिए। काफ़ी देर तक दोनों ने कुछ भी नहीं कहा।
सुधांशु जी ने उसे पूछा, " मिनी क्या हुआ? तुम परेशान हो। ऐसा क्या है जो तुम्हें इतना परेशान किए हुए हैं? "
"कुछ नहीं डैड! बस सोच रही थी कि अगर आप नहीं होते तो मेरा क्या होता? मैं कैसे और क्या करती?" नैना ने जवाब दिया।
"नहीं मिनी! ऐसा नहीं बोलते। तुम मेरी बेटी हो। और कोई भी पिता ये नहीं चाहेगा कि उसके बच्चे को कोई परेशानी हो।" सुधांशु ने कहा तो वो उनके गले लग गई।
उन्होंने उसके सर पे हाथ फेरते हुए कहा, " मिनी याद रखना, मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं। मैं तुम्हें कभी भी हारते हुए नहीं देख सकूंगा बच्चे। कभी भी नहीं।"
नैना उनसे अलग हुई तो उसकी आंखों में नमी सी थी।
उन्होंने उसके गाल पे हाथ रखते हुए कहा, -- " तुम मेरी सबसे बहादुर बच्ची हो। समझी मिनी। "
जवाब में नैना ने हां में सर हिलाया और कहा, - " जी डैड समझ गई! "
और फिर दोनों ही मुस्कराने लगे।
वो दोनों ही काफी देर तक गार्डन में टहलते रहे।
वो और नैना इधर उधर की बातें की और फिर अंदर आ गए।
नैना उन्हें उनके फर्स्ट फ्लोर के मास्टर बेडरूम में ले गई।
उन्हें दवाई दी, फ़िर बिस्तर पे लिटाया और अच्छे से चादर ओढ़ाकर सोने को कहा। उसने लाइट बंद की और दरवाज़ा हल्के से बंद करते हुए कमरे से बाहर आ गई।
जब नैना बाहर आई तो देखा रमेश जी भी सोने के लिए जा रहे थे।
उसने उन्हें रोकते हुए कहा, "अंकल रुकिए।"
आवाज़ सुन कर वो भी रुक गए और पीछे पलट कर देखा तो वो नैना थी।
हमेशा की तरह उसके चहरे पर कोई भाव नहीं है।
उन्होंने पूछा, " क्या हुआ छोटी मैडम। कुछ चाहिए आपको।"
"नहीं अंकल। मुझे बस जानना था कि वंदना सौरभ और गौरव ने खाना खाया। " नैना ने पूछा।
रमेश जी ने मुस्कुराते हुए कहा, " जी छोटी मैडम, उन सब ने भी खाना खा लिया है और अब तक तो सो भी चुके होंगे। आप चिंता मत करें। "
रमेश जी जानते थे कि नैना के शख्त चहरे के पीछे एक मासूम लड़की है जो सब की फिक्र करती है इसलिए उन्होंने उसके सवाल का बुरा नहीं माना। और सरल शब्दों में जवाब दिया।
दुनियां के लिए वो भले ही एक सख्त इंसान थी पर अपनो की बहुत परवाह करती थी। उसे दिखावा करना नहीं आता था।
नैना ने ये सुन राहत भरी और फिर कहा, -- " ठीक हैं अंकल आप भी अपनी दवाई लेकर सो जाएं। मैं चलती हूं। गुड नाईट। "
रमेश जी ने भी उसे गुड नाईट कहा और वहां से चले गए।
अब तक रात के एक बज रहे थे।
नैना ने अपने रूम में जाने से पहले एक बार परी और शान को देखा। वो दोनों ही अपने अपने रूम में गहरी नींद में सो रहे थे।
ये देख उसने राहत की सांस ली।
अब नैना भी सेकंड फ्लोर पे अपने कमरे में चली गई।
ये मास्टर बेडरूम था इस फ्लोर का जिसे उसके हिसाब से ही अरेंज किया गया था।
यहां आ कर उसे ऐसा लग रहा था जैसे कितने वक्त बाद वो अपने घर लौटी हो अपने कमरे में आई हो। यहां आ कर उसे एक सुकून महसूस होता था।
वो खिड़की के पास गई और उसे खोल दिया। जहां से बहुत अच्छी हवा आ रही थी।
कुछ देर खिड़की के पास खड़ी रहीं और फ़िर बिस्तर पे आ कर लेट गई। जल्दी ही उसे भी नींद आ गई।
TO BE CONTINUED…


Write a comment ...