
इधर कुल्लू में…
राजवीर और रेहाना देवी मां के मंदिर पहुंच गए थे। और उनके पहुंचे के बाद मौसम और भी ख़राब हो गया था।
वहां के पंडित जी ने उन दानों के लिए ही रुकने का इंतेज़ाम करवाया। क्योंकि दोनों ही भीग चुके थे। और क्योंकि रेहाना प्रेगनेंट थी तो उन्हें आराम की आवश्यकता थी।
पंडित जी की पत्नी ने रेहाना को एक साड़ी और दोशाला देते हुए बोली, “ बेटी ये लो कपड़े बदल लो और इसे ओढ़ लेना। ऐसी हालत में तुम्हारा ज्यादा देर भीगे रहना अच्छा नहीं। ”
साड़ी और दोशाला लेते हुए रेहाना ने हां में सर हिलाया और बोली, “ जी वो क्या आप उन्हें… ”
पंडित जी की पत्नी उसकी बातों को समझते हुए मुस्कुराए बिना रह न सकी। और उससे कहती है।
“ मैं समझती हूं तुम क्या जानना चाहती हो। तुम्हारे पति ने भी कपड़े बदल लिए हैं। वो पंडित जी से कुछ बात कर रहे हैं। वैसे भी जो भी पूजा होगी वो कल ही होगी । शायद सुबह तक मौसम भी ठीक हो जाए। लेकिन उससे पहले तुम कपड़े बदल लो। ”
“जी । ” कहते हुए रेहाना ने हां में सर हिलाया। और कपड़े बदलने चली गई।
उसे जाते देख पंडित जी की पत्नी बोली, “ बेटी अगर कोई दिक्कत हो तो कहना। मैं यहीं हूं। ”
थोड़ी देर बाद रेहाना पंडित जी की पत्नी की मदद चेंज कर लेती है। वो उसके लिए कुछ खाने को लाने का बोल चली जाती है।
कुछ ही देर में राजवीर एक सेवक के साथ वहां खाने के लिए अपने साथ कुछ लेकर आता है। दोनों को खाना खा कर आराम करने का बोल चला जाता था।
दिल्ली
ठाकुर विला
दिन भर की मस्ती के बाद अंशु बहुत थक गया था। और वो अपने नानू बड्डी की गोद में ही सो जाता है।
अशोक जी उसके बालों को सहलाते हुए अपने मासूम पोते को देख रहे थे।
तभी कमरे में रामदीन आया। और अशोक जी से बोला,
“ साहब जी छोटी मैडम और सर लौटने वाले हैं। पर अभी तक नहीं आए हैं। आपका खाना यहीं ला दूं? ”
“ रामदीन मुझे भूख नहीं है। गुड़िया और जमाई जी आ जाए तो उन्हें खिला देना। ” कहते हुए अपने गोद में सोए उस नन्हें शैतान के सर को सहलाते रहे।
रामदीन अशोक जी का बहुत ही वफादार था। उन्हें ऐसे सोच में गुम देख रामदीन भी कुछ हद तक समझ गया कि वो क्या सोच रहे होंगे।
तो उसने बड़े ही हिम्मत से अशोक जी से सवाल किया।
“ साहब जी एक बात पूछूं? ”
“ पूछो रामदीन । ”
“ साहब जी अगर आप उन्हें इतना याद करते हैं तो बुला क्यों नहीं लेते उन्हें? ”
रामदीन के इस सवाल पर अशोक जी के हाथ अंशु के सर पर रुक गए । उन्होंने ने उसे देखा और कम शब्दों में ही बात ख़त्म करते हुए कहा ,
“ तुम जानते हो न रामदीन वो नहीं आएगा। ”
“ साहब जी एक बार… ” रामदीन अपनी बात पूरी करता उससे पहले ही अशोक जी ने उसे बीच में टोकते हुए कहते हैं।
“ नाराज़ हो कर गया था वो यहां से। और गुड़िया से भी खफा है वो। और मैं और अब उसकी ज़िंदगी में दखल नहीं देना चाहता। ” अपने आख़िर शब्द कहते हुए जैसे अशोक जी खुद को समझाने में लगे थे।
लेकिन क्या उनका मन ये समझ पाया है।
रामदीन उनकी हालत समझता था लेकिन वो कुछ कर नहीं पा रहा था।
फिर भी उसने एक बार और उन्हें मानने की कोशिश करते हुए कहा,
“ साहब जी आप मनाएंगे और बुलाएंगे तो वो ज़रूर आएंगे। ”
रामदीन की ये बात सुनकर अशोक जी ने खुद से अपने मन में कहा,
“ जानता हूं मेरे एक बार बुलाने से वो आ जाएगा। लेकिन क्या यह सही होगा । नहीं, इससे बस उसकी बसी बसाई जिंदगी में कोलाहल मच जाएगा। और ये मै हरगिज़ नहीं चाहता। ”
तभी रामदीन की बातें सुनकर अशोक जी अपने ख्यालों से वापस लौटे।
“ साहब जी आप तो जानते हैं न वो पिता बनने वाले हैं। वो समझेंगे आपकी बात। और फिर अभी थोड़ी देर पहले ही तो आप ही कह रहे थे न कि आपका बहुत मन है उनके बच्चों को गोद में लेने का … ”
रामदीन अशोक जी के पास नीचे बैठते हुए आगे कहता है
“… और उनके वापस आने से आपकी ख्वाइश पूरी होगी। और छोटी मैडम को उनका खोया हुआ दोस्त और पूरा परिवार मिल जाएगा। और हमारे छोटे बाबा भी तो खुश होंगे न। भूलिए मत साहब जी आपने वचन भी दिया है। इस समय उन्हें उनके परिवार की जरूरत है। ”
उसने अपने साहब जी को समझाने की आख़िर कोशिश करते हुए कहा।
तो अशोक जी ने अंशु को अच्छे से अपने बगल में सुलाया और आंखें बंद कर लेटते हुए कहा,
“ रामदीन जाओ और आराम करो । मुझ भीे नींद आ रही है। ”
ये देख रामदीन निराश हुआ।
वो कमरे से जाते हुए बोला, “ ठीक है साहब जी। लेकिन मेरी बात आप सोचना एक बार ज़रूर। ”
अशोक जी ने कोई जवाब नहीं दिया। और रामदीन चला गया।
उसके जाते ही अशोक जी ने अंशु के माथे को चूमते हुए खुद से कहा,
“ तुम्हें मैं कैसे समझाऊं रामदीन की मेरे एक बार बुलाने पर वो आ तो जाएगा। लेकिन क्या वो पूरे मन से लौटेगी?
( ये कहते हुए उनके चेहरे पर उनके मन की उलझन साफ़ साफ़ दिखाई दे रही थी। जिसे वो अक्सर सब से छुपाए रहा करते हैं। पर शायद आज रामदीन की नज़र से ये बच न सका। )
मैंने किस तरह दिल को पत्थर बनाया था उस फैसले के लिए ये मैं ही जानता हूं। उस दिन मैंने उसकी उम्मीद को तोड़ दिया था। और अब मुझमें हिम्मत नहीं उसका सामना करने की।
हां ! बहुत याद आती है उसकी लेकिन मैं अब और उसकी ज़िंदगी में दखल तो नहीं दे सकता न? ये न तो तुम समझते हो और न ही गुड़िया।
खेर मेरी बस यही प्रार्थना है कि मेरे सभी बच्चे हमेशा खुश रहे और सुखी रहे।
और मेरे इस नन्हें शैतान के साथ मैं यहां खुश हूं। इसमें ही मैं उसके बच्चों को भी जी लूंगा। ”
वहीं दरवाज़े पर खड़ा रामदीन अशोक जी की सारी बातें सुनकर खुद से बोला, “ नहीं साहब जी मैं आपको यूं नहीं देख सकता। मैं बात करूंगा उनसे और उन्हें मेरी बात सुननी ही पड़ेगी। और अब आपकी इस उलझन को सुलझना ही होगा। ” और वहां से चला गया।
अगली सुबह…
कुल्लू में
मंदिर में ,
मौसम काफ़ी हद्द तक शांत हो चुका था।
राजवीर और रेहाना पूजा में बैठे हवन कर रहे थे। कि तभी रेहाना को दर्द शुरू हो जाता है। राजवीर ये देख बुरी तरह घबरा गया।
उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे।
वहीं आस पास बैठी कुछ औरतें और पंडित जी की पत्नी रेहाना को एक कमरे की तरफ़ संभाल कर ले गए। राजवीर भी उनके पीछे चल पड़ा।
पंडित जी की पत्नीे राजवीर से कहा, “ बेटा आप यहीं रुको बाहर । ”
राजवीर बाहर ही रुक गया। और बाहर ही इधर से उधर परेशानी में चक्कर लगाने लगा। शायद ही वो कभी इतना परेशान हुआ होगा जिंदगी में कभी।
तो पंडित जी बोले, “ बेटा चिंता मत करो। देवी मां है न सबकी चिंता करने के लिए। देखना तुम्हारी पत्नी और तुम्हारी संतान सभी सकुशल होंगे। ”
तो राजवीर ने उनके सामने हाथ जोड़ लिया।
थोड़ी ही देर बाद…
राजवीर और पंडित जी को बच्चों के रोने की आवाज़ सुनाई दी।
तब पंडित जी बोले, “ हम अभी देवी मां को ध्यानवाद करके आते हैं। आप यहीं रहें। ”
पंडित जी के जाते ही एक बुजुर्ग महिला कमरे से बाहर आती है और राजवीर से कहती है।
“ रे बेटवा बधाई हो तोका एक हही बार में बेटी अरु बेटा दोनों के बाप बने हो। ”
तो राजवीर उनके दोनों हाथों को पकड़ कर खुशी और घबराहट के मिले जुले भाव के साथ बोला,
“सच माई?।” अब ये सवाल था या उसकी खुशी का इज़हार ये तो उसे भी समझ नहीं आया।
राजवीर के मुंह से इस समय बोल नहीं फूट रहे थे। वो इतना खुश था कि चिल्ला चिल्ला कर सबको बताना चाहता था कि वो बाप बन गया है लेकिन आवाज़ थे कि उसकी जुबान साथ ही नहीं दे रहे थे।
उसकी ऐसी हालत देख वो माई मुस्कुराई और उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोली,
“ हां बेटवा। लक्ष्मी आई है तोहर घर मा। जा जाके देवी को माथा टेक। बिटिया बड़ी है। तोहर बेटवा छोट। अब जा जल्दी। ”
“ ठीक है माई। अभी जाते हैं। ” राजवीर किसी तरह ये बोला और मंदिर की तरफ़ भागा। देवी मां के मंदिर में उस बुजुर्ग महिला की बात मान माथा टेकने।
इधर,
पंडित जी ने अपने फोन से किसी को कॉल किया।
“ जय जगदम्बा ठाकुर साहब। ”
ये कोई और नहीं अशोक ठाकुर थे। जिन्हें पंडित जी ठाकुर साहब कहकर संबोधित किया।
“ जय जगदम्बा पंडित जी। कहिए क्या ख़बर है?” दूसरी तरफ से अशोक जी बोले।
“ ठाकुर साहब बधाई हो पोता और पोती दोनों हुए हैं। आपकी मनोकामना पूर्ण हुई। ”
ये सुनकर अशोक जी के होठों पे एक सुकून भरी मुस्कान तैर गई। एक संतोष उतर आया था उनके चेहरे पर।
वो आभार जताते हुए बोले, “ आपका बहुत बहुत ध्यानवाद पंडित जी। बहुत ही खुशी की ख़बर सुनाई आपने । सब ठीक तो है न वहां?” आख़िर में वो सवाल भी कर बैठे।
उनकी इस चिंता भरे सवाल को सुनकर पंडित जी ने उन्हें आश्वाशन देते हुए कहते हैं।
“ सब कुछ ठीक है ठाकुर साहब। राजवीर बेटा और बहुरानी दोनों ही ठीक से और समय से पहुंच गए थे कल। आज हवन भी अच्छे से सम्पन्न हुआ है। बच्चों पर देवी मां की कृपा है। अर्थात पूजन सफल रहा। ”
“ देवी मां की कृपा मिले बच्चों को इसलिए तो ये हवन और पूजा रखवाई थी आपसे। ” कहते हुए अशोक जी बैठ गए।
तो पंडित जी बोले, “ हम सब जानते हैं ठाकुर साहब। आपकी कही हर बात हमें याद है। हमने न तो राजवीर को और न ही बहुरानी को पता चलने दिया कि ये सब आपने ही उनके और उनकी आने वाली संतानों के लिए ये पूजन और हवन रखवाया था। आख़िर कैसे टाल देते आपकी बात। ”
“ पंडित जी हम तो आ नहीं पाएंगे। लेकिन जल्द ही हम कुछ सामान भेजवा देंगे आप बच्चों के नाम पर भंडारा और दान करवा दीजिएगा। ” अशोक जी ने उनसे आग्रह किया।
“ जैसी आपकी इच्छा ठाकुर साहब। ”
पंडित जी अशोक जी से बात कर रहे थे इस बात से अनजान की राजवीर उनकी बातें सुन रहा है।
हुआ यूं कि देवी मां के सामने माथा टेकने के बाद राजवीर पंडित जी को ढूंढते हुए इस तरफ़ आ गए। और उसने पंडित जी और अशोक जी को बातें करते अनजाने में ही सुन लिया। और तो और पंडित जी स्पीकर पे बात कर रहे थे क्योंकि उन्हें थोड़ा ऊंचा सुनाई देता था जिस कारण राजवीर दोनों तरफ़ की बातें सुन लेता है।
राजवीर खुद में हैरान रह गया। वो कुछ सोचते हुए खुद से बोला, “ मतलब पापा ने ये… ”
अब ये अधूरे शब्द सवाल थे या जवाब ये तो राजवीर ही जाने।
वहीं तभी पंडित जी से अशोक जी बोले, “ पंडित जी बच्चे चाहें जहां भी रहे मां बाप कभी उनका बुरा नहीं चाह सकते न। और फिर राजवीर तो हमें उपहार में मिला था। उसकी सलामती , उसकी खुशी सब हमें बेहद अज़ीज़ है। ”
“ चलिए ठाकुर साहब रखते हैं। बाद में बात होगी आपसे। जय जगदम्बा ठाकुर साहब। ”
“ जय जगदम्बा। ”
पंडित जी फोन रखते हैं और चले जाते हैं।
वहीं राजवीर जो खंबे के पीछे छुपा था वो बाहर आता है। और खुद से कहता है।
“ उन्हें सब पता था। वो सब जानते हुए भी मुझसे बात नहीं कर रहे। तो फिर ये सब क्या है? ”
सोचते हुए राजवीर वहीं बैठ गया।
तभी राजवीर का मोबाइल पर एक कॉल आया।
उसने फोन देखा तो ये रामदीन का कॉल था।
“ आज इतने समय बाद इनका कॉल। ” कहते हुए राजवीर ने कॉल उठाया।
“ हां काका बोलिए। सब ठीक तो है न?” राजवीर बोला।
“ सब ठीक है। बस कुछ बात करनी है आपसे। ” दूसरी तरफ से रामदीन ने कहा।
तो कुछ सोचकर राजवीर बोला, “ कहिए काका। ”
इसके बाद राजवीर रामदीन से कुछ बातें करता है।
“ ठीक है काका।। आप उनका ध्यान रखें मैं देखता हूं क्या बात है। ” राजवीर ने कहा।
तभी रामदीन ने राजवीर से कहा, “ माफ़ करना सर अगर छोटी मुंह बड़ी बात कही हो तो। लेकिन अपने साहब जी की बेबसी और न देख सका इसलिए आज आपको कॉल कर दिया। ”
कहते हुए रामदीन की आवाज़ में एक मायूसी थी जिसे महसूस कर राजवीर ने उन्हें समझाया।
“ कैसी बात कर रहें हैं आप काका। आप बड़े हैं। आपने पाला है मुझे । ऐसी बातें बोलकर मुझे शर्मिंदा मत कीजिए। बल्कि माफ़ी तो मुझे मांगनी चाहिए। ”
कहते हुए राजवीर ने एक गहरी सांस भरी।
फिर आगे कहा, “.… पर आप चिंता मत कीजिए। मैं अब सब ठीक कर दूंगा। और जो सही नहीं है उसे भी सही कर दूंगा। आपका बहुत बहुत ध्यानवाद जो आपने मुझे उस सच से रूबरू कराया जिससे मैं सालों से अनजान रहा। अब रखता हूं । ”
कहते हुए राजवीर ने कॉल रख दिया।
फिर वो खुद से बोला, “ सच में मां आपने जाते जाते मेरे सर पर एक बेहतरीन साया दिया है। थैंक्यू मां। अब देखना आप मैं सब ठीक कर दूंगा। ”
ये कहते हुए उसके होठों पर एक मुस्कान , चेहरे पर चमक, आंखों से खुशी और सुकून सब एक साथ आ गया।


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