
तीन दिन बाद…
ठाकुर विला…
विला के गेट से अंदर एक काले रंग की कार आती है। उस कार को देख सभी पहचान गए ये कौन है? और ये किसकी है?
एक सर्वेंट भागते हुए विला के अंदर भागा और दूसरा उस कार की तरफ।
कार का दरवाज़ा खुला और उसमें से राजवीर और रेहाना अपने दोनों बच्चों के साथ बाहर आते हैं।
वो सर्वेंट उन्हें देखते हुए खुशी से बोला, “ सर आप सच में आएं हैं? ”
“ क्या बात है मैं यहां खड़ा हूं और तुम्हें यकीन नहीं हो रहा। लगता है आजकल तुम्हें खाना घर में ठीक से नहीं मिल रहा। ” राजवीर ने उस सर्वेंट से मज़ाक करते हुए कहा तो उस सर्वेंट के कान लाल हो जाते है।
ये देख राजवीर ने हंसते हुए कहा, “ हे भगवान ! सुरेश तुम अभी तक शर्माते हो। ”
और कहते हुए हंस लगा।
वहीं वो सर्वेंट जिसका नाम सुरेश है। वो अपनी गर्दन झुकाए हुए रहा लेकिन कुछ बोला नहीं।
तो राजवीर ने उसे और छेड़ना बंद किया।
“ सुरेश घर के अंदर नहीं ले चलोगे। तुम्हारी भाभी और बच्चे इंतज़ार कर रहे हैं। ”
राजवीर की कही सुनकर सुरेश होश में आया और बोला, “ आप बहुत बुरे हैं छोटे साहब। ” और फिर रेहाना को देख हुए कहा, “ भाभी आप चलो मेरे साथ। अभी अभी ही आपका कमरा साफ़ किया है। आप और बच्चे आराम कर लो। मैं सामान भेजवा दूंगा। ”
इस पर रेहाना ने हां में सर हिलाया और सुरेश के साथ चल दी।
राजवीर गाड़ी के ड्राइवर से कुछ बात करने के बाद उनकी पीछे चला गया।
जैसे ही वो दरवाज़े पर पहुंचे सामने एक अधेड़ उम्र की औरत आरती की थाल लिए खड़ी थी। और उनके पीछे रामदीन।
उन्हें देख राजवीर ने उनके पाऊं छुए। और बोला, “ अरे सुलोचना काकी। कैसी हो? ”
तो सुलोचना काकी उनके सर पर हाथ फेरते हुए बोली, “ आपको देख लिया छोटे साहब। अब ये सुलोचना ठीक ही नहीं बहुत ही अच्छी हो गई। मनने तो उम्मीद न थी कि आपको देख पाऊंगी। पर देखो जगदम्बा माई ने सुन ली इस सुलोचना की। अब अपनी कोई शिकायत न जगदम्बा माई से। ”
इतना कहकर सुलोचना काकी ने उन चारों का तिलक किया और आरती कर गृह प्रवेश कराया।
सुलोचना काकी रेहाना से बोली, “ बहुरानी कमरा साफ़ मैंने करवा दिया है। आप जाके आराम करो । कोई जरूरत हो तो मनने आवाज़ दे देना। ”
“ जी काकी ! ” इतना कहते हुए रेहाना दोनों बच्चों को लिए अपने कमरे की तरफ़ चली गई।
उसके जाने के बाद…
“ काका पापा कहां है? ” राजवीर ने रामदीन को देखते हुए पूछा।
तो रामदीन बोला, “ साहब जी छोटे बाबा को लिए पार्क गए हैं। आते ही होंगे। ”
तब राजवीर बोला, “ ठीक है फिर। सुलोचना काकी चलो आज हम दोनों मिलकर नाश्ता बनाते हैं। ”
“ छोटे साहब अभी तो आए हो। और… ”
सुलोचना काकी की बात को बीच में काटते हुए उनके गले में हाथ डालते हुए कहता है।
“ अरे मेरी प्यारी काकी। आपके छोटे साहब अब बड़े हो गए हैं। और अब तो दो बच्चों का बाप भी बन गया हूं। और फिर सालों हो गए आपके साथ खाना बनाए। आज मना मत करो। ”
तो सुलोचना काकीकहते हुए राजवीर ने बड़े ही प्यारे अंदाज़ में अपना सर झुका लिया।
उसे ऐसे देख रामदीन और सुलोचना काकी हंसने लगे।
तो इस पर सुलोचना काकी मुस्कुराई और दोनों चल दिए किचेन की तरफ़।
उन दोनों को जाते देख रामदीन ने खुद से कहा, “ साहब जी माफ़ करना लेकिन शायद मेरा फैसला सही था। आज सालों बाद सुलोचना मुस्कुराई है। और आप भी छोटे साहब को देख बहुत खुश होंगे। मुझे विश्वास है। अब एक बार बस छोटी मैडम और सर आ जाएं तो ये बिखरा हुआ परिवार पूरा हो जाए। ” कहते हुए वहां से वो चला गया।
एक घंटे बाद…
अशोक जी अंशु के साथ ट्रैक सूट पहने हाथ में फुटबॉल लिए घर के अंदर आते हैं।
और आते ही दोनों धम से सोफे पे बैठ गए।
अंशु अशोक जी को देखते हुए बोला, “ नानू बड्डी भूख लगी है। ”
“ बेटा नाश्ता तो फ्रेश होने के बाद ही मिलेगा। वरना रामदीन आपकी मम्मा को बता देगा। ” कहते हुए अशोक जी ने आह भरी।
बात यह थी कि इन दोनों को सुबह जल्दी नहाने में मौत आती थी। कहने का मतलब है सुबह से इनसे नहाने की उम्मीद करना बेकार है।
लेकिन दोनों ही सोनारिका के डर से दोनों को ही नहाना पड़ता था क्योंकि सोनारिका के सख़्त ऑर्डर थे कि दोनों को बिना नहाए कोई नाश्ता नहीं मिलेगा।
और अगर किसीने उन्हें कुछ भी खाने को दिया तो फिर उनसे फिर सीधे सोनारिका बात करेगी। अरे बात क्या करेगी सज़ा देगी। जो कि किसी को भी नहीं चाहिए होती थी।
क्योंकि सोनारिका की सज़ा उन्हें सज़ा कम टॉर्चर ज्यादा लगती थी जिसके डर से वो गलती से भी गलती करने का नहीं सोचते थे।
दोनों ने एक दूसरे को देखा और फिर अपने अपने कमरे में चले गए। क्योंकि उन्हें सच में बहुत ज़ोर की भूख लगी थी।
वहीं राजवीर एप्रन पहने किचेन के गेट से उन्हें देख कर मुस्कुरा रहा था।
“ क्या हुआ छोटे साहब? ” सुलोचना काकी ने राजवीर को अशोक जी और अंशु को ऐसे देखते देखा तो पूछा।।
“ कुछ नहीं काकी बस देख रहा हूं आज भी आपकी छोटी मैडम का खौफ इस घर में कम नहीं हुआ है। ” राजवीर ने हंसते हुए कहा तो सुलोचना काकी मुंह दबाएं हंसने लगी।
“ हां सो तो है। ”
उनके इस जवाब पर राजवीर ने उनसे सवाल किया।
“ वैसे काकी आपकी छोटी मैडम हैं कहां? दिख नहीं रही। ”
तो सुलोचना काकी थोड़ी चिंता भरे स्वर में बोली, “ छोटी मैडम और जमाई बाबू तो यहां नहीं हैं। पांच दिन पहले छोटी मैडम और साहब जी में कोई बहस हुई थी। बात क्या थी वो तो नहीं पता। लेकिन छोटे साहब उस बहस के बाद साहब जी का बीपी बहुत बढ़ गया था।
वो तो जमाई बाबू ने उन्हें समझाया और शांत किया और फिर छोटी मैडम को अपने साथ बिजनेस ट्रिप पर विदेश ले गए। सुरेश के बाबा कहे थे कि कल तक आयेंगे। ”
ये सुनकर राजवीर को भी अब चिंता होने लगी।
तो उसने पूछा, “ काकी क्या पापा अभी भी… मेरा मतलब की? ”
राजवीर ने अपनी बात पूरी नहीं की तो सुलोचना काकी उसकी बात को समझते हुए बोली, “ नहीं! छोटे साहब जबसे छोटे बाबा ने घुटनों के बल चलना शुरू किया तबसे ही साहब जी का सारा समय उनका होकर रह गया। ऐसे जैसे उन्हें इस दुनियां से कोई मतलब ही न हो।”
कहते हुए वो राजवीर को देखती है और आगे कहती है।
“ … जानते हैं छोटे साहब, वो हर समय बस उनके साथ रहते हैं और उनके साथ बच्चे बन जाते हैं। जानते हो तीन दिन पहले क्या हुआ था? ”
तो राजवीर ने न में सर हिलाया। और तीन दिन पहले की बात को याद करते हुए सुलोचना काकी मुस्कुराई। राजवीर भी उनकी मुस्कान देख उनसे आंखों ही आंखों में पूछता है – जैसे क्या हुआ था काकी बताओ न।
तब सुलोचना काकी मुस्कुराते हुए और खीर में केसर डालते हुए बोली, “ रुको आपने ये सुलोचना बताएगी। ”
इतना कहकर सुलोचना काकी ने अशोक जी की और बिना हाथ कटे जो टमैटो केचअप वाला खून जो बिना खून के निकला था। वो पूरी घटना विस्तार से राजवीर को बता दी।
राजवीर हैरानी और खुशी के मिले जुले भाव से सुलोचना काकी को देखने लगा।
“ के हुआ विश्वास नहीं? ”
तो राजवीर ने न में सर हिलाया।
तो सुलोचना काकी मुस्कुराई। वो बोली, “ ये तो कुछ भी नहीं छोटे साहब। अभी आने दो दोनों को नाश्ते के टेबल पर खुद तसल्ली कर लेना। और हां टमैटो केचअप वाला नज़ारा देखने का मन हो तो … ” कहते हुए वो रुक गई।
उनकी अनकही बात को समझ राजवीर अपनी आंखें बड़ी बड़ी कर सुलोचना काकी को देखने लगा।
“ क्या सच में काकी? ”
तब सुलोचना काकी राजवीर को एक चमच हलवा खिलाते हुए आगे कहती है।
“बिल्कुल छोटे साहब। छोटे बाबा और साहब जी के कारनामे ही ऐसे हो गए हैं कि छोटी मैडम को उन पर नज़र रखने की नौबत आ गई। लेकिन फिर भी दोनों सुरेश के बाबा को लपेटने से पीछे नहीं हटते। इसलिए ऐसा किया छोटी मैडम ने। ”
कहते हुए वो हंसने लगी।
राजवीर ने सुलोचना काकी को हंसते देख खुदसे अपने मन में कहा , “ कितना कुछ मिस कर दिया न मैंने, तुमने और हम सबने। लेकिन पापा ने कभी सच नहीं कहा। कोई नहीं। अब मैं सब ठीक कर दूंगा। वैसे अभी तो पापा का रिएक्शन देखना है। ”
सोचते हुए वो अपने एप्रन को निकाल कर एक तरफ रख किचेन से निकल कर अपने कमरे की तरफ़ बढ़ जाता है।
To be continued…


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