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राज और आना!

उसकी ऐसी हालत देख डॉक्टर सुब्रमण्यम की आंखें भर आई। उन्होंने खुद को संभाला।

फिर राजवीर को देखते हुए बोली, “ ठीक है तुम उसका ध्यान रखो। अब मैं चलती हूं। बाकी जब उसके रिपोर्ट्स आ जाएंगे तो ही मैं आगे कुछ कहूंगी। लेकिन अभी के लिए ये समझलो उसे तुम्हारी बहुत ज़रूरत है। ”

फिर डॉक्टर सुब्रमण्यम राजवीर की पीठ थपथपाई और अपने साथ आई नर्स के साथ वहां से चली गई।

वहीं थोड़ी दूर खड़ी रेहाना ने सब सुन लिया था।

वो अपनी आंखों में नफ़रत लिए बोली, “ तुमने मुझसे मेरा सबकुछ छिन लिया। मुझे नफ़रत है तुमसे सोनारिका। नफ़रत है तुमसे। ” और फिर वहां से चली गई।

अब आगे—

पंद्रह दिन बाद…

आज ठाकुर विला में शांति हवन हो रहा था।

सामने अशोक जी, रामदीन और सुलोचना काकी की तस्वीर पर हार चढ़ा हुआ था।

सोनारिका को और राजवीर सफ़ेद कपड़े पहने हवन कर रहा थे।

पीछे जयदेव रेहाना और घर बाकि सर्वेंट्स बैठे हुए थे।

कोई बाहर वाला नहीं था।

हवन के बाद जो भी काम थे,

 उसकी जिम्मेदारी जयदेव को देकर राजवीर सोनारिका को लेकर उसके कमरे में आ गया।

उसने उसे दवाई दी और सुला दिया।

जल्दी ही दवाई के असर से वो सो गई।

कुछ देर तक उसने सोनारिका के मुरझाए हुए बेजान चेहरे को देखा।

फिर उसके माथे को चूमते हुए कहा, “ आना तुम बिल्कुल भी शांत मुझे अच्छी नहीं लगती।

मुझे मेरी आना मेरे साथ लड़ते झगड़ते ही अच्छी लगती है। तुम अकेली नहीं हो और न ही ये अकेला है। ”

कहते हुए उसने उसकी पेट को देखा।

वो फिर बोला, “ जो गलती मुझसे सालों पहले हुई थी उससे सुधारने जा रहा हूं। और आज के बाद फिर कभी कोई भी हम दोनों का फायदा नहीं उठा पाएगा।

न ही कोई हमें अगल कर सकेगा। हम एक परिवार है।

और हमेशा रहेंगे।

कोई भी राज और आना को अलग नहीं कर सकता। हम्मम…

अब तुम आराम करो मैं बस थोड़ी देर में आया। ”

इतना कहकर उसने उसे ब्लैंकेट ओढ़ा दिया। और कमरे को बंद कर बाहर निकल गया।

वो हॉल में आया एक सर्वेंट से कहा कि वो रेहाना को स्टडी रूम में आने को बोले और खुद वहां से चला आ।

ठाकुर विला के सिक्योरिटी रूम में…

जयदेव ( सिक्योरिटी हेड) अपने गार्ड्स के साथ विला की सिक्योरिटी को चेक कर रहा था। 

उसे राजवीर ने सख़्त ऑर्डर थे कि की विला की और सोनारिका की सिक्योरिटी में कोई भी चुक नहीं होनी चाहिए। 

वो अभी सभी को इंस्ट्रक्शंस दे ही रहा था कि एक गार्ड भागते हुए उसके पास आया और उसके कान में कुछ कहा। 

जिसे सुनकर राजवीर ने अपने एक सबसे खास गार्ड में से एक को देखते हुए कहा,  “ आधे घंटे में मुझे अल्फा स्कवॉड रेडी चाहिए । ”

तो यस सर कहके वो गार्ड वहां से जल्दी से चला गया। 

इसके बाद जयदेव ने बाक़ी सभी को देखते हुए कहा,  “ आप सभी को पता है आपको क्या करना है। इसलिए बी वेरी अलर्ट। कोई भी गलती नहीं होनी चाहिए। ”

तो सभी गार्ड्स ने एक साथ सर हिलाया। उसके बाद जयदेव ने सभी को भेज दिया। 

और खुद भी बाहर आया। 

ठीक उसी समय एक टैक्सी विला के बाहर आ के रुकी उससे एक लेडी बाहर आई। 

गार्ड ने उसे देख रोकने की कोशिश की तो जयदेव जिसकी नज़र उस लेडी पर पहले ही पड़ चुकी थी। 

उसने गार्ड से कहा, “ उन्हें आने दो। ” 

वो लेडी जल्दी से जयदेव को आकर कहती है —

“ थैंक्यू जयदेव। ”

“ कोई बात नहीं माम। आप अंदर चलिए। ” जयदेव ने कहा और दोनों अंदर की तरफ़ बढ़ गए। 

जब दोनों हॉल में पहुंचे ठीक उसी समय रेहाना वहां से गुजरी। लेकिन उसने उन दोनों को पे ध्यान नहीं दिया।।

जयदेव उस लेडी को सोनारिका के पास लेकर उस रूम में पहुंचा जहां वो इस समय सोई हुई थी। 

जयदेव उस लेडी को देखते हुए बोला,  “ अर्पिता माम आप यहीं रहिए। मैडम के पास। मुझे राजवीर सर को एक इंपॉर्टेंट न्यूज देनी है। मुझे जाना होगा । ”

वो लेडी सोनारिका और राजवीर की बचपन की बेस्ट फ्रेंड अर्पिता है।

अर्पिता दीक्षित  …

ये इन दोनों की सिर्फ बचपन की दोस्त ही नहीं अशोक ठाकुर की सबसे ख़ास और इकलौती मुंह बोली बहन की बेटी भी है। 

(अर्पिता इस कहानी में एक अहम किरदार है। जिसके बारे में हम आगे जानेंगे। अभी के लिए इतना ही…)

“ ठीक है जयदेव । ये लो , ये राज को दे देना। थोड़ी देर में लॉयर भी आते होगें। ” अर्पिता ने जयदेव को एक फाइल देते हुए कहा। 

जयदेव ने वो फाइल ली और हां में सर हिलाया और वहां से चला गया। 

अर्पिता सोनारिका के पास बैठ कुछ पल उसे देखती है और फिर उसके बालों को सहलाते हुए बोली,  “ सोना तू फिक़्र न कर। मैं हूं न तेरे साथ। तेरा राज भी तो है तेरे साथ।

जो न तुझे कुछ होने देगा और न ही हमारे इस जूनियर कपूर को। ”

कहते हुए उसने अपना दूसरा हाथ उसके पेट पर रख दिया। 

तभी उसका फोन रिंग करता । 

अर्पिता कॉल उठते हुए बोली,  “ बोलो… ”

दूसरी तरफ से किसी ने कुछ कहा जिसे सुनकर अर्पिता की आंखें लाल हो गई। 

वो सोनारिका के पास से उठी और खिड़की के पास आते हुए बोली, 

“ सारे सबूत इकट्ठा करो। और उससे जिंदा रखना। लेकिन जीने लायक नहीं।

सांसे चलनी चाहिए। वो मांगें मौत की भीख। पर उसे मौत भीख में भी नहीं मिलनी चाहिए।” 

इतना कहकर वो कॉल रख देती है। 

उसकी आंखें अभी भी लाल थी। लेकिन धीरे धीरे खुद को शांत करने की कोशिश कर रही थी। 

कुछ देर बाद उसने खुद को शांत किया और वापस सोनारिका के पास आ कर बैठ गई।

उसने उसके हाथों को थमा और उसे चूम लिया। और अपनी बेस्ट फ्रेंड को देखने लगी। 

इधर, स्टडी रूम!

राजवीर रेहाना का इंतज़ार करते हुए खिड़की के पास अपने दोनों हाथ पीछे बांधे खड़ा था।

थोड़ी देर में स्टडी का दरवाज़ा खुला और रेहाना आई।

“ आपने मुझे बुलाया वीर? ” रेहाना ने पूछा।

“ हां ! ” राजवीर ने एक शब्द में जवाब दिया।

तभी एक बार और स्टडी का दरवाज़ा खुला और जयदेव एक वकील के साथ अंदर आते हुए कहा, “ राजवीर सर वकील साहब आए हैं। ”

इस पर राजवीर ने कुछ भी नहीं कहा।

वो चुप चाप जा कर किंग साइज सोफा चेयर बैठ गया।

“ सब बैठ जाएं। ”

तो जयदेव और वकील साहब एक साथ बैठ गए। और रेहाना सिंगल सोफे पर बैठ गई।

कुछ देर की ख़ामोशी के बाद…

राजवीर ने वकील साहब को देखते हुए कहा, “ वकील साहब पेपर्स।” कहते हुए अपना हाथ आगे किया।

तो वकील साहब ने बिना देर किए दो फाइल्स उसके हाथ में रख दी।

राजवीर ने एक फाइल को साइड में रखते हुए दूसरी फाइल खोली और उसे पढ़ने लगा।

कुछ देर के बाद वो रेहाना को देखते हुए कहा, “ मिसेज रेहाना राजवीर सिंह। ”

राजवीर को इस तरह से खुद का नाम लेते हुए देख रेहाना को एक अजीब सी बेचैनी होने लगी।

वो खुद को शांत कर राजवीर से बोली, “ वीर आप इस तरह से मेरा नाम क्यों ले रहे हैं? ”

“क्योंकि आज के बाद मैं तुम्हारा ये नाम कभी भी नहीं लूंगा।” उसने बिल्कुल शांति से कहा। 

“ मतलब ? आप कहना क्या चाहते हैं? ” रेहाना ने बेचैनी से सवाल किया तो कुछ पल राजवीर ने उसे देखा 

और फिर…

 राजवीर ने अपना पेन उठाया और उस फाइल के पन्नों पर पहले साइन किया और फिर उसे रेहाना के सामने रख दिया।

“ मिसेज रेहाना राजवीर सिंह मैं चाहता हूं कि आप इस पर साइन कर खुद को और मुझे इस घुटन आज़ाद कर दें। ”

रेहाना ने कुछ भी नहीं कहा। उसकी नज़र तो बस उन पेपर्स पर टिकी हुई थी।

वो बस एक टक उन पेपर्स को ही देख रही थी।

 To be continued…

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